शिक्षा, चिकित्सा और हम एक मूल्यांकन
अपने लेखों के संकलन शिक्षा, चिकित्सा और हम में विद्यानन्द जी शिक्षा द्वारा सामाजिक बदलाव के बहुत से पहलुओं पर चर्चा करते हैं। उनका यह प्रयास वास्तव में सराहनीय ही नहीं बल्कि अनुकरणीय है। शिक्षा द्वारा व्यक्ति की विचाराधारा और उसके स्वास्थ्य पर सीधा सम्बन्ध पड़ता है। शिक्षार्थी एक सजीव इकाई है जिसके दो स्वास्थ्य हैं, शारीरिक और मानसिक और इससे जुड़े अनेक प्रश्न हैं। सार्थक शिक्षा का अर्थ ही अपने आप में व्यापक है। वास्तव में हमारी शिक्षा पद्धति अपने उद्देश्य में कितनी सार्थक है, विद्यानन्द जी इसके बारे में चिन्तित दिखाई पड़ते हैं। जो जीवन का यथार्थ है उसका ज्ञान हमें शिक्षा ही कराती है। जो हमें दिखाई देता है या जो बात हमें बताई जाती है, समाज की जिन समस्याओं की तरफ हमारा ध्यानाकर्षित किया जाता है वा चर्चा की जाती है, वास्तव में वह वैसा ही नहीं है। यथार्थ कुछ और ही है। हमें एक अन्वेषक की भाँति प्रवास करना होगा और वास्तव में देखा जाय तो सार्थक शिक्षा की यही उपयोगिता है। विकृतियों और कुरीतियों के बन्धन से छुटकारा पाकर स्वतंत्र चिंतन की क्षमता प्राप्त करना, जीवन और विश्व के यथार्थ को समझ सकने योग्य दृष्टि प्राप्त करना ही शिक्षा का मूल प्रयोजन है। इसमें शिक्षक और शिक्षाथी के बीच का तालमेल बहुत आवश्यक है। ग्रहण करने की क्षमता प्रत्येक शिक्षार्थी का उसके परिवेश, जैविक अवस्था, ग्राह्य क्षमता आदि विभिन्न आयामों पर निर्भर करती है। सार्थक सीखने के लिए आवश्यक है हमारी संज्ञानात्मक संरचना। सीखने के लिए सामग्री और प्रेरणा। लेखक ने विभिन्न विषयों के शिक्षण हेतु कुछ नियंत्रण बिन्दुओं की चर्चा की है जो शिक्षण को सरल व प्रभावी बना सकती है।
शिक्षा के क्षेत्र में रहते हुए मैंने अपनी पुस्तक में लिखा है कि शिक्षकों के दायित्व का विस्तार होना चाहिए। विषमताओं और विलक्षणताओं वाले इस देश के बदलते परिवेश पर नज़र रखनी होगी। विभिन्न परिस्थितियों और तकनीकी से पोपित युवाओं के मस्तिष्क को सावधानी से संवारने की आवश्यकता है जिसके लिए शिक्षकों को दक्ष होना पड़ेगा तभी वह इस महती ज़िम्मेदारी को निभा पाएँगे। छात्रों की पल-पल बदलती भावनाओं, आकांक्षाओं को गहराई से समझने की आवश्यकता है तभी हम इन्हें टूटने से और समाज को प्रतिकूल परिस्थितियों से बचा सकते हैं। सार्थक शिक्षा का यही उद्देश्य भी होना चाहिये। रचनाकार ने सार्थक शिक्षा की चचाँ करते हुए औपचारिक तरीके से अनौपचारिक शिक्षा को विकसित करने पर बल दिया है।
शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन करना होगा, ऐसी भाषणबाज़ी तो प्रायः सुनने को मिल जाती है लेकिन यह परिवर्तन होगा कय? लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति से अब तक शिक्षा स्तर में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं जा सका है। लेखक का विचार है कि यदि अपनी राष्ट्रभाषा को परिष्कृत और समृद्ध बनाया जाय तो भविष्य के लिए यह अधिक लाभकारी हो सकता है। वहीं लेखक नई शिक्षा नीति पर पुनर्विचार के लिए युवाओं हेतु दुनिया की समस्त भाषाओं के अध्ययन की सुविधा उपलब्ध कराने की योजना पर विचार करने को प्रोत्साहित करते हैं। उनका मानना है कि इससे रोज़गार के अवसर के साथ हमारी राष्ट्रभाषा भी समृद्ध होगी। हालाँकि ऐसी सम्भावना कम ही दिखाई पड़ती है।
अभी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की योजना केन्द्रीय शिक्षा विभाग ने लांच की है जिसमें शिक्षा के सभी पक्षों से स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में सार्थक और परिवर्तनकारी सुधार के अनुपालन की दिशा में अपील की गई है। इसके अनुसार ऐसी शिक्षा संवादात्मक, लचीली और समावेशी है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है। गान्धी जी के अनुसार भी व्यक्ति के शरीर, मन तथा आत्मा का सर्वागीण और सर्वोत्कृष्ट विकास शिक्षा द्वारा ही किया जा सकता है। शिक्षा का शाब्दिक अर्थ है सीखने और सिखाने की क्रिया जो समाज में निरन्तर चलने वाली सामाजिक क्रिया है। शिक्षा द्वारा ज्ञान और कौशल का विकास कर मनुष्य को योग्य नागरिक बनाया जाता है।






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